धक धक सीना धड़के पहला भाग

दिव्या जब चलती थी तो उसका हुस्न अधभरी गागर के भांति छलकता था। कोई उसे चाहे आगे से निहारता था या पीछे से, आग वो दोनों के सीने में सुलगा देती थी। उसके हुस्न को देख जवान लौंडे ही नहीं बूढ़े भी खुजली करने लगते थे। शहर से पढ़के आई लड़कियों के बारे में वैसे भी गॉंव के लोगों के सोच दयनीय होती है। मगर एक लड़की का बरेली से एल एल बी करके यूँ भरे भरे जिस्म में वापिस आना गॉंव के कुआरे विआहे ,रंडवे सब की नजर उस कन्या पर थी। पर वो इतनी तेज़ तरार थी की किसी का हौंसला नहीं पड़ता था की उसकी आँख से आँख भी मिला सके।
गर्मी का मौसम था ,और अमावस की रातें थी। आधी रात को अँधेरा और भी घना हो गया था। ऐसी रातें ही प्रेमियों के मिलन की रात होती है। जब तन मन की गर्मी बाहर की गर्मी से ज्यादा सताने लगती है। दिव्या ने घर के गेट को हौले से खोला और दबे पॉंव वो अपनी मंजिल की तरफ बढ़ने लगी। कानों में इयरफोन लगा रखे थे।चाल में जितनी मादकता थी उससे ज़्यादा था में चल रहा कोहराम। दीवार के साथ सटकर चल रही थी कि कोई देख ना ले। फिर धीरे से वो माइक पे कुछ बोली। और एक घर के आगे वाले गेट को हल्का धक्का दिया।
धक्के के साथ ही गेट खुला वो अंदर हुई और धड़म से गेट बंद हुआ.मानव की मजबूत बाजुओं ने दिव्या को अपने आगोश में भर लिया। ना जाने कब से दोनों मिलने के लिए तरस रहे थे।और अकेले में इस पहिली मुलाकात को कितनी मुश्किल से प्लैन किया था।
दोनों के जिस्मों से पसीने की खुशबू घुलमिल रही थी। आगोश में एक दुसरे को भर लिया था। बातों का सिलसिला जैसे टूट ही गया था। मानव की गर्म सांसे अपनी गर्दन पर महसूस करते ही दिव्या ने बाँहों को और कसके भींच लिया था। जैसे ही मानव के होंठ उसकी गर्दन पर टकराए मानों किसी कोयले में आग भड़क उठी हो। मानव के होंठ गर्दन पे फिसलने लगे। हाथ पीठ पर कसने लगे और एक जगह न रुककर पूरी पीठ को सहलाने लगे थे। अचानक वो रुका उसके चेहरे को हाथों में भरा और आँखों में आँखे डालकर उसके होंठो को होंठो से छूते हुए फिर पीछे खिसकाकर एक दम से दिव्या के होंठो को कस लिया। नर्म होंठो को वो किसी भौरें की भांति फूल समझकर चूसने लगा। उसके हाथ गर्दन को सहलाने लगे थे। और खिसकते हुए टी शर्ट के अंदर घुसते चले गए। जिस जौवन को देख कर हर कोई मचलता था अब वो उसके हाथों में मचल रहा था.उसकी उंगलियों की कसावट जैसे ही बढ़ रही थी दिव्या की सांस फूल रही थी। उसको सिर्फ मानव के होंठो का सहारा था। मानव ने अपने हाथो से उसको कपड़ों के बोझ से मुक्त क्र दिया था। उसने पहना भी क्या था ?सिर्फ टी शर्ट और पजामा ,और उसके नीचे कुछ भी नहीं मिलन के नियमों को वो जानती थी। मानव के हाथों की हरकतों ने उसके नग्न शरीर को बैचैन क्र दिया था। इसलिए वो उसकी बाँहों में झूल गई थी। #HarjotKiKalam
मानव ने दिव्या को बाँहों में उठा कर खटिया पे लिटा दिया। खुद बादलों की भांति उसके जिस्म पर लेट गया। उसके होंठ चिहरे से गर्दन पर गर्दन से नीचे खिसकने लगे। उसने हर हिस्से को होंठो से चूमा और जीभ से सहलाया .उसकी हर हरकत से दिव्या की जाँघे उसकी कमर को कस लेती थी। जिनके भीतर उसकी उँगलियाँ छलकती गागर को सहला रही थी।
हर बीत रहे पल के साथ जिस्मों में ये गर्मी बढ़ती जा रही थी। धरती की प्यास को बादल भली भांति समझ रहे थे। उस प्यास को बुझाना ही मकसद था। जैसे ही वो पल आया तो दिव्या के मुख से एक आह के सिवा कुछ न निकला। उसकी उंगलिया मानव की नंगी पीठ पर चिपक गई थीं। उसने अपनी कमर को पूरी तरह से मानव की कमर से सटा लिया था। खटिया और दोनों की सिसकारियों के सिवा अँधेरी रात में कुछ वि सुनाई नहीं दे रहा था। पूरे जिस्म के हर कोने से पानी ही पानी छलक रहा था। मानव उसको बाँहों में भींच कर पूरी रफ्तार से अपनी रेस दौड़ रहा था। जब तक दिव्या के जाँघे उसकी कमर पर कस न गई और उसके मुँह से निकला बस !! और कुछ पल के बाद मानव भी उसके उप्पर ही लुढ़क गया था।
मगर श्रावण की बारिश भी वार वार होती है इसलिए दोनों के मिलन की ये बारिश उस रात कई वार हुई। जब तक तन मन के शांत हो जाने का भर्म न हुआ।
भौर के उजाले से कुछ समय पहले ही दिव्या घर वापिस चलने लगी। रात भर के मिलन ने उसकी चाल को बदल दिया था.जिसमें लचकता अधिक थी और जिस्म में मादकता भी। वो खुद में खोई अपने घर के अंदर दाखिल हुई। इस बात से अनजान कि कोई दो आँखों ने उसको देख लिया था। यारी के चर्चे छिड़ने वाले थे। हलाकि देखने वाला अंदाज़ा न लगा पाया की लड़की थी कौन दिव्या या उसकी भाभी दीपिका !!!!
कुछ भी ही गांव वालों को मसालेदार बातें करने का मौका मिलना वाला था पर उससे पहले हम पढ़ेंगे कि मानव और दिव्या आखिर मिले कैसे और प्यार के इस खेल के मिलन की रात तक का सफर कैसे पहुंचा। अगले हिस्से में।

【चलता】

कविता पहला अनुभव वशीकरण तीन हिंदी कामुक कविताएं पढ़े कहानी नील रूपमती

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